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8/05/2021

[पीडीऍफ़] 365 दिन कैसे खुश रहें - Books Review And Free Pdf Download

दोस्तो! इस पुस्तक को लिखने से पहले मैं विभिन्न उम्र, व्यवसाय, क्षेत्र तथा विभिन्न राज्यों के हजारों लोगों से मिला और उनसे बातचीत की। उनके खुश रहने के कारणों के बारे में जानकारी मालूम की।

लोगों के खुश रहने के अपने-अपने तरीके हैंकोई कहता है, 'जब मैं दो बालटी गरम पानी से नहा लेता हूँ तो मुझे खुशी मिलती है।' 'जब मुझे अपने दोस्तों के मेसेज मिलते हैं, मुझे अपार खुशी मिलती है।' जब कोई कहती है, 'मैं काफी सुंदर लग रही हूँ, यह सुनकर मुझे खुशी होती है।




' 'जब मेरे पापा मुझे अपनी बाइक चलाने के लिए कहते हैं तो मैं खुशी से उछल पड़ता हूँ।' 'जब टीचर कहते हैं कि कल क्लास नहीं है, उस दिन मेरी खशी का ठिकाना ही नहीं रहता है।'

मैंने लोगों को उन बातों की सूची बनाने के लिए कहा, जिस चीज को प्राप्त करने के बाद उन्हें सबसे अधिक खुशी मिलती है। सबसे अधिक आश्चर्य तो तब हुआ, जब लोग खुशी की सूची बनाते हुए परेशान दिखे। उनकी खुशी की सूची एक-दो बातों से लंबी नहीं रही थी। इसका मतलब यह निकलता है कि लोग खुशी की तलाश नहीं करते हैं,

इसलिए उन्हें यह पता ही नहीं है कि किस बात में ज्यादा खुशी मिलती है। खुशी की बजाय उन्हें दुःख देने या परेशान करनेवाली बातों की सूची बनाने के लिए कहा तो उन्होंने दु:खी करनेवाली बातों की लंबी सूची तैयार करके दे दी।


लोगों की खुशी की सूची को पढ़कर आपको उसमें खुश रहने की प्रेरणा नहीं मिलेगी; बल्कि आप उन बातों को सुनकर आश्चर्य में पड़ सकते हैं कि क्या लोगों को ऐसी बातों में भी खुशी मिल सकती है!


मुंबई के गोरेगाँव में रहनेवाले, प्रिंटिंग प्रेस का कारोबार देखनेवाले एक महाशय ने खुशी की सूची में लिखा-'मेरा कुत्ता जब मेरे सामने दुम हिलाता है तो मेरा दिल खुशियों से झूम उठता है।' दिल्ली के रहनेवाले एक व्यवसायी का कहना था, 'लोगों के फटे जूते देखकर उन्हें खुशी मिलती है।'


इलाहाबाद के एक युवक ने कहा, 'आसमान में छाए बादलों के समूह को देखकर मुझे अपार प्रसन्नता होती है।' पटना के रहनेवाले तथा नागपुर में पढ़ाई करनेवाले एक छात्र ने सूची में लिखा-'बिल्डिंग की लिफ्ट में चढ़नेउतरने में बड़ी खुशी मिलती है।'


सप्ताह यानी सातों दिन हर किसी के लिए अलग-अलग तरह की खुशियाँ लाते हैं। अनेक छात्रों के लिए रविवार बड़ी खुशी का दिन होता है। वहीं अनेक छात्र इसे सबसे बोरियत भरा दिन मानते हैं। कुछ लोग रिटायरमेंट को खुशियों से भरा मानते हैं, कुछ रिटायरमेंट को दु:खों की गठरी मिलना बताते हैं।


कानपुर में रहनेवाली सुरेखा कहती हैं, 'मैं जब आईने के सामने खड़ी होती हूँ तो अपने आपसे बात कर मुझे अपार खुशी होती है। दिल्ली की मंजू कहती हैं, 'मुझे जब कोई अच्छा सा कमेंट देता है, मुझे खुशी मिलती है।' पटना की रहनेवाली लेखिका पूजा का कहना है, 'जब मेरी रचनाएँ कहीं छपती हैं या स्वीकृति-पत्र मिलता है, तब मुझे खुशी मिलती है।' नागपुर की 22 वर्षीया सारिका फिल्म की शौकीन हैं। उनका कहना है, 'जब मैं फर्स्ट शो फिल्म देखती हूँ, तब मुझे खुशी मिलती है।' ऐसी अनेक बातें हैं, जिसे पाकर लोग खुश रहते हैं।



भरपूर खुशी मिलने पर लोग सुध-बुध खो देते हैं। उन्हें इस बारे में कुछ पता ही नहीं होता है कि वे किस हालत में हैं। आर्कमिडीज का सिद्धांत खोजनेवाले वैज्ञानिक आर्कमिडीज अपने सारे कपड़े उतारकर एक दिन बॉथ टब में नहा रहे थे। जैसे ही वे टब में घुसे, उसमें से कुछ पानी छलककर बाहर आ गया।

 

उन्होंने अपने सिद्धांत को पकड़ लिया। टब से निकलकर वे तुरंत अपनी प्रयोगशाला की ओर भागने लगे। उस वक्त उनके शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं था। वे चिल्लाते जा रहे थे–'यूरेका, यूरेका!'-यानी मिल गया, मिल गया।

 

क्रिकेट मैच के दौरान मंदिरा बेदी इतनी उत्साह में थीं कि उन्हें अपने कपड़ों का होश ही नहीं रहा। इसका सीधा प्रसारण टी.वी. के माध्यम से पूरी दुनिया में होता रहा। इससे मंदिरा को कोई फर्क नहीं पड़ा। वह अपनी खुशी को लेकर ही व्यस्त थीं।

जिन लोगों को खुश रहने की आदत होती है, वे हर हाल में खुश रहते हैं। इसीलिए तो लोग जहाँ कहीं भी रहते हैं -हिमालय की बर्फवाली पहाड़ी पर या समुद्र के किनारे, सुदूर जंगल में या रेगिस्तान में उन्हें वहाँ रहने की मजबूरी है, यह बात नहीं। वे वहाँ खुश हैं, इसलिए वहाँ रहते हैं।

 

ओशो के अनसार, 'सच्ची खशी वह नहीं है, जो हम चाहते हैं। एक पल की खुशी दूसरे पल दु:खों की सौगात भी बन सकती है। जब हम खुश होते हैं, तब हमारे मन के किसी कोने में उसके खत्म होने का डर भी होता है।'

 

रुपया, पैसा, प्रसिद्धि भी बहुत ज्यादा खुशियाँ दे दें, ऐसा नहीं होता। एक लॉटरी पानेवाला जिंदगी भर खश नहीं रह सकता। कुछ ही सालों में उसे खुशियों की तलाश करनी ही पड़ती है, क्योंकि खुशियाँ उसके जीवन से गायब हो चुकी होती हैं। सिर्फ पैसों की वजह से लोग खुश हो जाएँ, ऐसा नहीं है। उनका जीवन भी तनावों से भरा होता है। सबकुछ होने के बाद भी वे आत्महत्या करने जैसे खतरनाक कदम उठा लेते हैं।

 

जो हमेशा हँसता है, वह दुनिया का सबसे खुश व्यक्ति हो, ऐसा नहीं कह सकते। एक हैरान-परेशान व्यक्ति एक मनोचिकित्सक के पास गया। उसने अपनी ढेर सारी परेशानियाँ डॉक्टर को बताई और खुश रहने के उपाय के लिए सलाह माँगी।

 

डॉक्टर ने मरीज की पूरी बात सुनकर कहा, "सामने खिड़की से बाहर शहर का नजारा देख रहे हो?" मरीज ने कहा, "देख रहा हूँ।" "इसमें कोई खास बात नजर आ रही है?" "नहीं, ऐसी कोई खास बात नजर नहीं आ रही है।"

"क्या आपको पता है, इन दिनों शहर में सर्कस आया हुआ है? सर्कस ने शहर के लोगों के मन में खुशियाँ भर दी हैं।" मरीज ने आश्चर्य से पूछा, "वह कैसे?"

 

"लगता है, तुमने अभी तक सर्कस नहीं देखा है। एक काम करो, आज शाम तुम सर्कस देखने के लिए जाओ। उस सर्कस में एक दुबला-पतला, मरियल सा जोकर है, जो अपने कारनामों से लोगों को हँसा-हँसाकर लोट-पोट कर देता है। जब तुम उसे देखोगे तो तुम्हें उससे खुश रहने की प्रेरणा मिलेगी।" "डॉक्टर, ऐसा नहीं हो सकता।" "क्यों?" डॉक्टर ने आश्चर्य से पूछा।

 

"डॉक्टर साहब, उस सर्कस का जोकर मैं ही हूँ।"

चेहरे पर हँसी और मुसकान को देखकर खुशी को परिभाषित नहीं किया जा सकता है। खुशी चेहरे पर नहीं, अंतर की गहराई में होती है। जो चेहरे पर झलके, यह जरूरी नहीं है। उन सबके खुश रहने की बातों को जानकर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि खुश रहने का कोई फॉर्मूला नहीं होता। लोग अपने आप में खुश रहते हैं।

 

किसे किस बात में खुशी मिलेगी, यह कहा नहीं जा सकता। वे खुद भी सही-सही नहीं बता सकते हैं कि उन्हें किस बात पर खुशी मिलेगी।

 

हर कोई अपने आप में खुश रहता है या अपने आप में दु:खी रहता है। खुश रहने का लोगों का अपना-अपना सिद्धांत है, अपना-अपना तरीका है, अपना-अपना विचार है। हर किसी का सिद्धांत, विचार या तरीका दूसरे से मेल खा जाए, ऐसा हमेशा संभव नहीं है।

 

उनकी बातों से यह निष्कर्ष निकलता है कि खुश रहना अपने हाथ में है। किसी को बड़ी उपलब्धि पर खुशी मिलती है तो किसी को छोटी उपलब्धि पर बड़ी खुशी मिलती है। कोई छोटी बात पर बहुत खुश हो जाता है, कोई बड़ी बात पर भी खुश नहीं हो पाता है। यानी जो जिस बात में अधिक खुशी ढूँढ़ता है, वह उतना ही अधिक खुश होता है। जो कम खुशी ढूँढ़ता है, वह कम खुश रहता है।

 

अंत में इतना कहना चाहूँगा, एक मटका आग में तपने के बाद ही हर किसी को ठंडा पानी दे सकता है। बाँसुरी गरम छड़ को बरदाश्त कर अपने अंदर से संगीत की मीठी तान निकाल सकती है।

 

खुशियाँ दिखाई नहीं देती, महसूस की जाती हैं। खुशियाँ हमारे आस-पास ही बिखरी पड़ी हैं। बस, उन्हें समेटने की जरूरत है, सुनहरे पलों में कैद करने की जरूरत है। हम अगर छोटे-छोटे पहलुओं में खुशियाँ ढूँढें तो हमारे पास दु:ख नाम की चीज नहीं रह जाएगी।

 

 







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